इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक योग गुरु रामदेव की कंपनी दिव्य फार्मेसी को उत्तराखंड हाईकोर्ड से झटका लगा है. कोर्ट ने उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड के आदेश के ख़िलाफ़ दायर याचिका को ख़ारिज कर दिया है. याचिका में कहा गया था कि दिव्य फार्मेसी पूरी तरह से भारतीय कंपनी है और उसे 2002 के क़ानून के तहत मुनाफ़ा साझा न करने की छूट मिलनी चाहिए.
कोर्ट ने अपने फ़ैसले में ले में पेश आना चाहिए.जैव विविधता क़ानून 2002 का हवाला दिया और कहा कि भारतीय कंपनियों को भी विदेशी फर्मों की तरह इस माम क्योंकि वो कारोबार के लिए प्राकृतिक संसाधानों का जमकर इस्तेमाल करती हैं, इसलिए उन्हें किसानों और आदिवासियों से अपना मुनाफ़ा साझा करना चाहिए.
कोर्ट ने कहा कि इसमें शक नहीं कि जैविक संसाधन जिस जगह पर होते हैं, वह उसी देश या इलाक़े की संपत्ति होते हैं. लेकिन वे इसी के साथ उन लोगों की संपत्ति भी होते हैं, जिन्होंने सालों से उनका संरक्षण किया होता है.
मध्य रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी सुनील उदासी ने बताया कि रेल मंत्रालय का नया आदेश एक जनवरी 2019 से प्रभावी होगा.
नई व्यवस्था के तहत वरिष्ठ नागरिकों की तरह अब 60 साल की उम्र वाले ट्रांसजेंडर्स को भी रेल किराये पर 40 प्रतिशत छूट मिलेगी. इससे पहले, रेलवे ने अक्टूबर में थर्ड जेंडर के लिए आरक्षण फॉर्म में बदलाव किया था. इसमें आरक्षण फॉर्म में मेल, फीमेल के साथ ट्रांसजेंडर कॉलम जोड़ा गया था.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक मुंबई के चेंबूर में एक रिहायशी हाउसिंग सोसाइटी में लगी आग से चार महिलाओं समेत 5 लोगों की मौत हो गई. आग चेंबूर के सरगम सोसाइटी में एक बहुमंजिला इमारत में लगी. राजावड़ी अस्पताल के डॉक्टरों ने पाँच लोगों की मौत की पुष्टि की है.
फायर ब्रिगेड के मुताबिक उसे शाम करीब सवा सात बजे 15 मंज़िला इमारत की 10वीं मंजिल पर आग लगने की सूचना मिली. सूचना मिलते ही फायर ब्रिगेड की पांच गाड़ियों और एंबुलेंस को मौके पर भेजा गया. इमारत में फंसे लोगों को निकालने में राहत एवं बचाव दल को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी. इसे लेवल-3 की आग घोषित किया गया है.
बीते 17 दिसंबर को मुंबई के एक सरकारी अस्पताल में लगी आग से 10 लोगों की मौत हो गई थी और कई घायल हो गए थे.
बिज़नेस स्टैंडर्ड के मुताबिक एक चैनल द्वारा किए गए स्टिंग ऑपरेशन में फंसे उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्रियों के निजी सचिवों को निलंबित कर दिया गया है और उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया है.
इस मामले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से गठित एसआईटी को 10 दिन में जांच पूरी करने का आदेश दिया है.
कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर के निजी सचिव ओम प्रकाश कश्यप, खनन राज्य मंत्री अर्चना पांडेय के निजी सचिव एसपी त्रिपाठी और शिक्षा राज्य मंत्री संदीप सिंह के निजी सचिव संतोष अवस्थी को निलंबित किया गया है.
Thursday, December 27, 2018
Tuesday, December 18, 2018
हिंदू से मुस्लिम बनीं हदिया के पिता के.एम. अशोकन बीजेपी में हुए शामिल
केरल की रहने वाली हदिया धर्म परिवर्तन कर हिंदू से मुस्लिम बन गई थीं. इस्लाम धर्म अपनाने के बाद उन्होंने एक मुस्लिम शख़्स शफ़िन जहां से शादी कर ली थी. हदिया के पिता ने इस शादी का विरोध किया और इसे 'लव जिहाद' क़रार दिया था.
विवाद लंबा चला और आख़िर में सुप्रीम कोर्ट ने हदिया के पक्ष में फ़ैसला सुनाया और उन्हें अपने पति के साथ रहने की इजाज़त दे दी.
चार साल में बदली विचारधारा
पूर्व सैनिक अशोकन ने बीबीसी से कहा, "मैं किसी राजनीतिक पार्टी में नहीं था. हालांकि मैं कम्युनिस्ट विचारधारा रखता था. लेकिन पिछले चार साल में मेरी सोच में बदलाव आया और अब मैं बीजेपी की विचारधारा वाला शख़्स हो गया हूं."
तो क्या उनकी विचारधारा बीजेपी से उस वक़्त मेल खाने लगी जब उनकी बेटी अखिला अशोकन ने इस्लाम धर्म अपनाकर एक मुस्लिम लड़के से शादी कर ली?
इस सवाल के जवाब में अशोकन कहते हैं, "कुछ ऐसा ही समझिए."
अशोकन ने कहा कि उन्होंने असम, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में काम किया है और उन्हें महसूस हुआ कि "इन राज्यों में हालात बेहद ख़राब हैं. और भारत में कम्युनिस्ट पार्टी कभी अपने पैर नहीं जमा पाएगी. लेकिन बीजेपी केरल में विस्तार करेगी."
अशोकन उस वक़्त चर्चा में आए थे जब उन्होंने अपनी 23 साल की बेटी अखिला (हदिया) के धर्म परिवर्तन का विरोध किया था.
वो इस मामले को केरल हाईकोर्ट ले गए थे. उन्होंने कहा था कि उनकी बेटी 'लव जिहाद' की पीड़ित है.
'लव जिहाद' इन दो शब्दों को बीजेपी और उसके सहयोगियों ने ही गढ़ा है. उनका कहना है कि मुस्लिम पुरुष हिंदू महिलाओं को बहला-फुसलाकर उनका धर्म परिवर्तन करा देते हैं.
अशोकन ने अपने दामाद पर यह आरोप भी लगाया था कि वो उनकी बेटी का 'ब्रेनवॉश' कर चरमपंथी बनाने के लिए सीरिया ले जाना चाहता है.
अशोकन की याचिका पर केरल हाईकोर्ट ने हदिया और शफ़िन जहां की शादी को ख़ारिज कर दिया था और हदिया को उनके पिता को सौंप दिया था.
लेकिन फिर शफ़िन जहां ने हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. सुप्रीम कोर्ट ने हदिया से उसकी मर्ज़ी पूछी और हाईकोर्ट के फ़ैसले को पलट दिया.
एक सवाल के जवाब में अशोकन ने कहा, "उससे (हदिया) मेरी बात होती रहती है, वो ठीक है. हमने उससे फोन पर बात की थी."
क्या आपने उसे और उसके पति को घर बुलाया?
अशोकन कहते हैं, "मैं उसे क्यों बुलाऊंगा? अगर वो आना चाहती होगी तो आ जाएगी."
केरल के बीजेपी अध्यक्ष श्रीधरन पिल्लई ने बीबीसी से कहा, "इलाके में वो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के चेहरे के तौर पर जाने जाते हैं. इसलिए वहां के लोग उन्हें पहचानते हैं."
विवाद लंबा चला और आख़िर में सुप्रीम कोर्ट ने हदिया के पक्ष में फ़ैसला सुनाया और उन्हें अपने पति के साथ रहने की इजाज़त दे दी.
चार साल में बदली विचारधारा
पूर्व सैनिक अशोकन ने बीबीसी से कहा, "मैं किसी राजनीतिक पार्टी में नहीं था. हालांकि मैं कम्युनिस्ट विचारधारा रखता था. लेकिन पिछले चार साल में मेरी सोच में बदलाव आया और अब मैं बीजेपी की विचारधारा वाला शख़्स हो गया हूं."
तो क्या उनकी विचारधारा बीजेपी से उस वक़्त मेल खाने लगी जब उनकी बेटी अखिला अशोकन ने इस्लाम धर्म अपनाकर एक मुस्लिम लड़के से शादी कर ली?
इस सवाल के जवाब में अशोकन कहते हैं, "कुछ ऐसा ही समझिए."
अशोकन ने कहा कि उन्होंने असम, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में काम किया है और उन्हें महसूस हुआ कि "इन राज्यों में हालात बेहद ख़राब हैं. और भारत में कम्युनिस्ट पार्टी कभी अपने पैर नहीं जमा पाएगी. लेकिन बीजेपी केरल में विस्तार करेगी."
अशोकन उस वक़्त चर्चा में आए थे जब उन्होंने अपनी 23 साल की बेटी अखिला (हदिया) के धर्म परिवर्तन का विरोध किया था.
वो इस मामले को केरल हाईकोर्ट ले गए थे. उन्होंने कहा था कि उनकी बेटी 'लव जिहाद' की पीड़ित है.
'लव जिहाद' इन दो शब्दों को बीजेपी और उसके सहयोगियों ने ही गढ़ा है. उनका कहना है कि मुस्लिम पुरुष हिंदू महिलाओं को बहला-फुसलाकर उनका धर्म परिवर्तन करा देते हैं.
अशोकन ने अपने दामाद पर यह आरोप भी लगाया था कि वो उनकी बेटी का 'ब्रेनवॉश' कर चरमपंथी बनाने के लिए सीरिया ले जाना चाहता है.
अशोकन की याचिका पर केरल हाईकोर्ट ने हदिया और शफ़िन जहां की शादी को ख़ारिज कर दिया था और हदिया को उनके पिता को सौंप दिया था.
लेकिन फिर शफ़िन जहां ने हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. सुप्रीम कोर्ट ने हदिया से उसकी मर्ज़ी पूछी और हाईकोर्ट के फ़ैसले को पलट दिया.
एक सवाल के जवाब में अशोकन ने कहा, "उससे (हदिया) मेरी बात होती रहती है, वो ठीक है. हमने उससे फोन पर बात की थी."
क्या आपने उसे और उसके पति को घर बुलाया?
अशोकन कहते हैं, "मैं उसे क्यों बुलाऊंगा? अगर वो आना चाहती होगी तो आ जाएगी."
केरल के बीजेपी अध्यक्ष श्रीधरन पिल्लई ने बीबीसी से कहा, "इलाके में वो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के चेहरे के तौर पर जाने जाते हैं. इसलिए वहां के लोग उन्हें पहचानते हैं."
Friday, December 14, 2018
25 साल पहले सीएम बनने से चूके थे नाथ, गांधी परिवार की तीन पीढ़ियों के साथ किया काम
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री होंगे। कांग्रेस विधायक दल की बैठक में यह फैसला लिया गया। इससे पहले कमलनाथ और सिंधिया ने दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की। इस बैठक में सोनिया गांधी और प्रियंका भी मौजूद थीं। बैठक में कमलनाथ के नाम पर मुहर लगी। हालांकि, भोपाल में विधायक दल की बैठक के बाद इसका ऐलान किया गया।
कमलनाथ के बारे में तीन किस्से
मप्र के विधानसभा चुनाव से पहले इसी साल मई में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया था। वे छिंदवाड़ा से नौ बार के सांसद हैं। कानपुर में जन्मे कमलनाथ कांग्रेस के उन मौजूदा नेताओं में से एक हैं, जिन्होंने गांधी परिवार की तीन पीढ़ी के साथ काम किया है।
इंदिरा गांधी ने उन्हें तीसरा बेटा बताया था
कमलनाथ संजय गांधी के स्कूली दोस्त बताए जाते हैं। वे 1980 में पहली बार छिंदवाड़ा से सांसद बने थे। इस चुनाव में प्रचार के दौरान इंदिरा गांधी ने उन्हें अपना तीसरा बेटा बताया था।
संजय गांधी का ध्यान रखने जानबूझकर जेल गए थे
आपातकाल के बाद 1979 में जनता पार्टी की सरकार के दौरान संजय गांधी को एक मामले में कोर्ट ने तिहाड़ जेल भेज दिया। तब इंदिरा संजय की सुरक्षा को लेकर चिंतित थीं। कहा जाता है कि तब कमलनाथ जानबूझकर एक जज से लड़े। जज ने उन्हें भी अवमानना के चलते सात दिन के लिए तिहाड़ भेज दिया, जहां वे संजय गांधी के साथ रहे।
25 साल पहले सीएम बनने से चूके
72 साल के कमलनाथ मप्र की छिंदवाड़ा लोकसभा सीट से 9 बार से सांसद हैं। वे 1980, 1985, 1989, 1991, 1998, 1999, 2004, 2009, 2014 में सांसद बने। 1993 में भी कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने की चर्चा थी। बताया जाता है कि तब अर्जुन सिंह ने दिग्विजय सिंह का नाम आगे कर दिया। इस तरह कमलनाथ 25 साल पहले सीएम बनने से चूक गए थे।
1997 में छिंदवाड़ा से हार गए थे कमलनाथ
1996 में कमलनाथ पर हवाला कांड के आरोप लगे थे। उस वक्त पार्टी ने उनकी पत्नी को टिकट दिया था। वे चुनाव जीत गईं। लेकिन अगले साल उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 1997 में यहां उपचुनाव हुए थे, इसमें कमलनाथ हार गए। कमलनाथ को सुंदरलाल पटवा ने हराया था।
यूपीए सरकारों में कई बार केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं कमलनाथ
कमलनाथ 1991 में राज्य पर्यावरण मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), 1995-1996 टेक्सटाइल मंत्रालय (स्वतंत्र प्रभार) मंत्री रहे। उन्होंने 2001-2004 तक कांग्रेस के महासचिव का पद संभाला। वे 2004-2009 तक यूपीए सरकार में केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री रहे। 2009 में कमलनाथ सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री बने। 2011 में उन्हें शहरी विकास मंत्री बनाए गए। 2012 में उन्हें संसदीय कार्य मंत्री का अतिरिक्त प्रभार दिया गया।
कमलनाथ के बारे में तीन किस्से
मप्र के विधानसभा चुनाव से पहले इसी साल मई में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया था। वे छिंदवाड़ा से नौ बार के सांसद हैं। कानपुर में जन्मे कमलनाथ कांग्रेस के उन मौजूदा नेताओं में से एक हैं, जिन्होंने गांधी परिवार की तीन पीढ़ी के साथ काम किया है।
इंदिरा गांधी ने उन्हें तीसरा बेटा बताया था
कमलनाथ संजय गांधी के स्कूली दोस्त बताए जाते हैं। वे 1980 में पहली बार छिंदवाड़ा से सांसद बने थे। इस चुनाव में प्रचार के दौरान इंदिरा गांधी ने उन्हें अपना तीसरा बेटा बताया था।
संजय गांधी का ध्यान रखने जानबूझकर जेल गए थे
आपातकाल के बाद 1979 में जनता पार्टी की सरकार के दौरान संजय गांधी को एक मामले में कोर्ट ने तिहाड़ जेल भेज दिया। तब इंदिरा संजय की सुरक्षा को लेकर चिंतित थीं। कहा जाता है कि तब कमलनाथ जानबूझकर एक जज से लड़े। जज ने उन्हें भी अवमानना के चलते सात दिन के लिए तिहाड़ भेज दिया, जहां वे संजय गांधी के साथ रहे।
25 साल पहले सीएम बनने से चूके
72 साल के कमलनाथ मप्र की छिंदवाड़ा लोकसभा सीट से 9 बार से सांसद हैं। वे 1980, 1985, 1989, 1991, 1998, 1999, 2004, 2009, 2014 में सांसद बने। 1993 में भी कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने की चर्चा थी। बताया जाता है कि तब अर्जुन सिंह ने दिग्विजय सिंह का नाम आगे कर दिया। इस तरह कमलनाथ 25 साल पहले सीएम बनने से चूक गए थे।
1997 में छिंदवाड़ा से हार गए थे कमलनाथ
1996 में कमलनाथ पर हवाला कांड के आरोप लगे थे। उस वक्त पार्टी ने उनकी पत्नी को टिकट दिया था। वे चुनाव जीत गईं। लेकिन अगले साल उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 1997 में यहां उपचुनाव हुए थे, इसमें कमलनाथ हार गए। कमलनाथ को सुंदरलाल पटवा ने हराया था।
यूपीए सरकारों में कई बार केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं कमलनाथ
कमलनाथ 1991 में राज्य पर्यावरण मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), 1995-1996 टेक्सटाइल मंत्रालय (स्वतंत्र प्रभार) मंत्री रहे। उन्होंने 2001-2004 तक कांग्रेस के महासचिव का पद संभाला। वे 2004-2009 तक यूपीए सरकार में केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री रहे। 2009 में कमलनाथ सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री बने। 2011 में उन्हें शहरी विकास मंत्री बनाए गए। 2012 में उन्हें संसदीय कार्य मंत्री का अतिरिक्त प्रभार दिया गया।
Thursday, November 22, 2018
अडॉल्फ हिटलर की ख़ातिर 'ज़हर चखने' वाली औरत की कहानी
कल्पना करें कि तरह-तरह के लज़ीज खाने से भरी एक मेज़ है और उसके आसपास कई नौजवान महिलाएं बैठी हैं. उन्हें बहुत तेज भूख भी लग रही है.
लेकिन, उस खाने से उनकी मौत हो सकती है. फिर भी उन्हें वो सब खाना पड़ता है.
पर 1942 में ये कल्पना एक हक़ीक़त थी. वो दौर द्वितीय विश्वयुद्ध का था. जब 15 महिलाओं को अपनी जान ताक पर रखकर जर्मनी के तानाशाह अडॉल्फ हिटलर की जान बचाने का काम दिया गया था.
इन 15 महिलाओं का काम था कि वो अडॉल्फ हिटलर के लिए बने खाने को पहले चखा करती थीं ताकि उसमें ज़हर है या नहीं, ये पता लग सके.
हैरानी वाली बात ये है कि दिसंबर 2012 से पहले कोई इस बारे में जानता तक नहीं था. ये राज़ तब खुला जब मार्गोट वोक नाम की एक महिला ने 70 साल की चुप्पी तोड़ने का फैसला किया और बताया कि वो हिटलर की उस टीम में थी जो खाना चखने का काम करता था. इन्हें टेस्टर्स भी कहते हैं.
इटली की एक लेखिका रोज़ेला पॉस्टोरिनो ने जब मार्गोट वोक के बारे में रोम के एक अख़बार में पढ़ा तो उन्हें इस कहानी ने बेहद आकर्षित किया.
फिर क्या था रोज़ेला पॉस्टोरिनो ने उन महिलाओं की खोज शुरू कर दी जिनका इस्तेमाल गिनी पिग की तरह किया जााता था और वो हिटलर के लिए बना खाना चखती थीं.
इस खोज का नतीजे बनी एक किताब ''ला कैटादोरा'', जिसकी शुरुआत मार्गोट वोक से होती है. इस किताब को इटली में कई पुरस्कार मिले. अब ये किताब स्पैनिश में भी प्रकाशित होने वाली है.
हिटलर के लिए काम करने वाली इन महिलाओं पर किताब क्यों लिखी?
एक दिन मैंने इटली के एक अख़बार में मार्गोट वोक के बारे में एक लेख पढ़ा. मार्गोट बर्लिन में रहने वालीं 96 साल की बुजुर्ग महिला थीं जिन्होंने पहली बार हिटलर की टेस्टर होने के काम को ज़ाहिर किया था.
यह बहुत हैरान करने वाला था, इसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता था. मैं ख़ुद पॉलैंड में वुल्फशांज़ गई, जिसे वुल्फ़ डेन भी कहते हैं, द्वितीय विश्वयुद्ध 2 के दौरान अडॉल्फ हिटलर का सबसे बड़ा मिलिट्री बैरक था. वहां मैंने कई लोगों से पूछा कि वो हिटलर के टेस्टर्स के बारे में कुछ जानते हैं क्या, लेकिन किसी ने इसके बारे में नहीं सुना था. यह कुछ ऐसा था जो कभी प्रकाशित नहीं हुआ था.
और तब, उन्होंने जांच करनी शुरू की...
मैं वाकई नहीं जानती थी कि मैं क्या करना चाहती हूं. लेकिन, मुझे लग रहा था कि कुछ मुझे बुला रहा है, मुझे खींच रहा है. मैं मार्गोट वोक से मिलना चाहती थी. इसलिए मैंने उस मीडिया हाउस से मदद मांगी जिसने उनका इंटरव्यू किया था. लेकिन, वहां से कोई जवाब नहीं आया.
लेकिन, जर्मनी की एक दोस्त के जरिए मुझे मार्गोट के घर का पता मिला और मैंने उनसे मिलने के लिए उन्हें ख़त लिखा लेकिन उसी हफ़्ते उनकी मौत हो गई.
इसके बाद मैं निराश हो गई. मुझे लगा कि मार्गोट की मौत इस बात की निशानी है कि मुझे ये प्रोजेक्ट छोड़ देना चाहिए.
लेकिन, मेरे दिमाग से ये कहानी निकल भी नहीं पा रही थी. एक ऐसी विरोधाभासी कहानी जो पूरी मानवीयत का विरोधाभास समाहित करती है.
लेकिन, उस खाने से उनकी मौत हो सकती है. फिर भी उन्हें वो सब खाना पड़ता है.
पर 1942 में ये कल्पना एक हक़ीक़त थी. वो दौर द्वितीय विश्वयुद्ध का था. जब 15 महिलाओं को अपनी जान ताक पर रखकर जर्मनी के तानाशाह अडॉल्फ हिटलर की जान बचाने का काम दिया गया था.
इन 15 महिलाओं का काम था कि वो अडॉल्फ हिटलर के लिए बने खाने को पहले चखा करती थीं ताकि उसमें ज़हर है या नहीं, ये पता लग सके.
हैरानी वाली बात ये है कि दिसंबर 2012 से पहले कोई इस बारे में जानता तक नहीं था. ये राज़ तब खुला जब मार्गोट वोक नाम की एक महिला ने 70 साल की चुप्पी तोड़ने का फैसला किया और बताया कि वो हिटलर की उस टीम में थी जो खाना चखने का काम करता था. इन्हें टेस्टर्स भी कहते हैं.
इटली की एक लेखिका रोज़ेला पॉस्टोरिनो ने जब मार्गोट वोक के बारे में रोम के एक अख़बार में पढ़ा तो उन्हें इस कहानी ने बेहद आकर्षित किया.
फिर क्या था रोज़ेला पॉस्टोरिनो ने उन महिलाओं की खोज शुरू कर दी जिनका इस्तेमाल गिनी पिग की तरह किया जााता था और वो हिटलर के लिए बना खाना चखती थीं.
इस खोज का नतीजे बनी एक किताब ''ला कैटादोरा'', जिसकी शुरुआत मार्गोट वोक से होती है. इस किताब को इटली में कई पुरस्कार मिले. अब ये किताब स्पैनिश में भी प्रकाशित होने वाली है.
हिटलर के लिए काम करने वाली इन महिलाओं पर किताब क्यों लिखी?
एक दिन मैंने इटली के एक अख़बार में मार्गोट वोक के बारे में एक लेख पढ़ा. मार्गोट बर्लिन में रहने वालीं 96 साल की बुजुर्ग महिला थीं जिन्होंने पहली बार हिटलर की टेस्टर होने के काम को ज़ाहिर किया था.
यह बहुत हैरान करने वाला था, इसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता था. मैं ख़ुद पॉलैंड में वुल्फशांज़ गई, जिसे वुल्फ़ डेन भी कहते हैं, द्वितीय विश्वयुद्ध 2 के दौरान अडॉल्फ हिटलर का सबसे बड़ा मिलिट्री बैरक था. वहां मैंने कई लोगों से पूछा कि वो हिटलर के टेस्टर्स के बारे में कुछ जानते हैं क्या, लेकिन किसी ने इसके बारे में नहीं सुना था. यह कुछ ऐसा था जो कभी प्रकाशित नहीं हुआ था.
और तब, उन्होंने जांच करनी शुरू की...
मैं वाकई नहीं जानती थी कि मैं क्या करना चाहती हूं. लेकिन, मुझे लग रहा था कि कुछ मुझे बुला रहा है, मुझे खींच रहा है. मैं मार्गोट वोक से मिलना चाहती थी. इसलिए मैंने उस मीडिया हाउस से मदद मांगी जिसने उनका इंटरव्यू किया था. लेकिन, वहां से कोई जवाब नहीं आया.
लेकिन, जर्मनी की एक दोस्त के जरिए मुझे मार्गोट के घर का पता मिला और मैंने उनसे मिलने के लिए उन्हें ख़त लिखा लेकिन उसी हफ़्ते उनकी मौत हो गई.
इसके बाद मैं निराश हो गई. मुझे लगा कि मार्गोट की मौत इस बात की निशानी है कि मुझे ये प्रोजेक्ट छोड़ देना चाहिए.
लेकिन, मेरे दिमाग से ये कहानी निकल भी नहीं पा रही थी. एक ऐसी विरोधाभासी कहानी जो पूरी मानवीयत का विरोधाभास समाहित करती है.
Monday, November 12, 2018
देश का पहला इनलैंड वॉटरवे टर्मिनल शुरू
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को 15वीं बार अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी पहुंचे। रामनगर स्थित गंगा तट पर नेशनल वॉटरवे-1 के मल्टी मॉडल टर्मिनल (बंदरगाह) की शुरुआत की। यह देश का पहला इनलैंड वॉटरवे (नदी मार्ग) टर्मिनल है। इस दौरान मोदी ने कहा कि काशीवासी साक्षी हैं कि चार साल पहले जब मैंने बनारस और हल्दिया को जल मार्ग से कनेक्ट करने का विचार रखा था, तो किस तरह से इसका मजाक उड़ाया गया था। थोड़ी देर पहले कलकत्ता से आए जहाज ने आलोचना करने वालों को जवाब दे दिया है।
मोदी ने कहा, "वाराणसी और देश विकास के उस कार्य का गवाह बना है, जो दशकों पहले होना जरूरी था, लेकिन नहीं हुआ। आज देश नेक्स्ट जेनरेशन इन्फ्रास्ट्रक्चर की अवधारणा का गवाह बना है। इस पवित्र भूमि से हर किसी का अध्यात्मिक संपर्क तो है ही, आज जल-थल-नभ तीनों को जोड़ने वाली नई ऊर्जा का संचार हुआ है। कुछ देर पहले मैंने नदी मार्ग से पहुंचे देश के पहले कंटेनर व्हीकल का स्वागत किया। इस काम में दशकों लग गए, लेकिन आज मैं खुश हूं कि देश ने जो सपना देखा था, वो आज काशी की धरती पर साकार हुआ है।"
'जल मार्ग से समय और पैसा दोनों बचेगा'
प्रधानमंत्री ने कहा, ''मल्टी मॉडर्न टर्मिनल से जब रो-रो सर्विस शुरू होगी तो लंबी दूरी तय करने के लिए आपको एक नया विकल्प मिलेगा। बड़े-बड़े वाहन जहाज से सीधे दूसरी जगह पहुंच जाएंगे। जितना सामान इस जहाज से आया है, उसे अगर सड़क से लाया जाता तो 16 ट्रक लगते। जल मार्ग से लाने की वजह से प्रति कंटेनर लगभग साढ़े चार हजार रुपए की बचत हुई है। 70-75 हजार रुपया सीधा बच गया है। जल मार्ग से समय और पैसा बचेगा।''
'आजादी के बाद जल मार्गों की उपेक्षा हुई'
उन्होंने कहा, ''एक जमाना था, जब देश की नदियों में बड़े-बड़े जहाज चला करते थे। लेकिन, आजादी के बाद इतने सालों में इन मार्गों की उपेक्षा की गई। देश की सामार्थ्य के साथ पहले की सरकारों ने अन्याय किया, उसे समाप्त करने का काम किया। आज देश में 100 से ज्यादा नेशनल वाटर वे पर काम हो रहा है। वाराणसी-हल्दिया उनमें से एक है। 5 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करके इस रास्ते में सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। पूर्वी भारत के बड़े हिस्से को बहुत बड़ा फायदा होने वाला है। ये जलमार्ग सिर्फ सामान की ढुलाई के लिए काम नहीं आएगा, टूरिज्म को, हमारे तीर्थों को पूर्वी एशियाई देशों को जोड़ने का काम करने वाला है।''
मोदी ने पहले मालवाहक जहाज की अगवानी की
मोदी ने हल्दिया से वाराणसी पहुंचे पहले मालवाहक जहाज की अगवानी की। 1620 किलोमीटर लंबे वॉटरवे से गंगा के जरिए वाराणसी से कोलकाता के हल्दिया के बीच माल ढुलाई आसान होगी। इसे जलमार्ग विकास परियोजना के तहत तैयार किया गया। इसके लिए वर्ल्ड बैंक से भी मदद मिली है।
मोदी ने कहा, "वाराणसी और देश विकास के उस कार्य का गवाह बना है, जो दशकों पहले होना जरूरी था, लेकिन नहीं हुआ। आज देश नेक्स्ट जेनरेशन इन्फ्रास्ट्रक्चर की अवधारणा का गवाह बना है। इस पवित्र भूमि से हर किसी का अध्यात्मिक संपर्क तो है ही, आज जल-थल-नभ तीनों को जोड़ने वाली नई ऊर्जा का संचार हुआ है। कुछ देर पहले मैंने नदी मार्ग से पहुंचे देश के पहले कंटेनर व्हीकल का स्वागत किया। इस काम में दशकों लग गए, लेकिन आज मैं खुश हूं कि देश ने जो सपना देखा था, वो आज काशी की धरती पर साकार हुआ है।"
'जल मार्ग से समय और पैसा दोनों बचेगा'
प्रधानमंत्री ने कहा, ''मल्टी मॉडर्न टर्मिनल से जब रो-रो सर्विस शुरू होगी तो लंबी दूरी तय करने के लिए आपको एक नया विकल्प मिलेगा। बड़े-बड़े वाहन जहाज से सीधे दूसरी जगह पहुंच जाएंगे। जितना सामान इस जहाज से आया है, उसे अगर सड़क से लाया जाता तो 16 ट्रक लगते। जल मार्ग से लाने की वजह से प्रति कंटेनर लगभग साढ़े चार हजार रुपए की बचत हुई है। 70-75 हजार रुपया सीधा बच गया है। जल मार्ग से समय और पैसा बचेगा।''
'आजादी के बाद जल मार्गों की उपेक्षा हुई'
उन्होंने कहा, ''एक जमाना था, जब देश की नदियों में बड़े-बड़े जहाज चला करते थे। लेकिन, आजादी के बाद इतने सालों में इन मार्गों की उपेक्षा की गई। देश की सामार्थ्य के साथ पहले की सरकारों ने अन्याय किया, उसे समाप्त करने का काम किया। आज देश में 100 से ज्यादा नेशनल वाटर वे पर काम हो रहा है। वाराणसी-हल्दिया उनमें से एक है। 5 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करके इस रास्ते में सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। पूर्वी भारत के बड़े हिस्से को बहुत बड़ा फायदा होने वाला है। ये जलमार्ग सिर्फ सामान की ढुलाई के लिए काम नहीं आएगा, टूरिज्म को, हमारे तीर्थों को पूर्वी एशियाई देशों को जोड़ने का काम करने वाला है।''
मोदी ने पहले मालवाहक जहाज की अगवानी की
मोदी ने हल्दिया से वाराणसी पहुंचे पहले मालवाहक जहाज की अगवानी की। 1620 किलोमीटर लंबे वॉटरवे से गंगा के जरिए वाराणसी से कोलकाता के हल्दिया के बीच माल ढुलाई आसान होगी। इसे जलमार्ग विकास परियोजना के तहत तैयार किया गया। इसके लिए वर्ल्ड बैंक से भी मदद मिली है।
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