कल्पना करें कि तरह-तरह के लज़ीज खाने से भरी एक मेज़ है और उसके आसपास कई नौजवान महिलाएं बैठी हैं. उन्हें बहुत तेज भूख भी लग रही है.
लेकिन, उस खाने से उनकी मौत हो सकती है. फिर भी उन्हें वो सब खाना पड़ता है.
पर 1942 में ये कल्पना एक हक़ीक़त थी. वो दौर द्वितीय विश्वयुद्ध का था. जब 15 महिलाओं को अपनी जान ताक पर रखकर जर्मनी के तानाशाह अडॉल्फ हिटलर की जान बचाने का काम दिया गया था.
इन 15 महिलाओं का काम था कि वो अडॉल्फ हिटलर के लिए बने खाने को पहले चखा करती थीं ताकि उसमें ज़हर है या नहीं, ये पता लग सके.
हैरानी वाली बात ये है कि दिसंबर 2012 से पहले कोई इस बारे में जानता तक नहीं था. ये राज़ तब खुला जब मार्गोट वोक नाम की एक महिला ने 70 साल की चुप्पी तोड़ने का फैसला किया और बताया कि वो हिटलर की उस टीम में थी जो खाना चखने का काम करता था. इन्हें टेस्टर्स भी कहते हैं.
इटली की एक लेखिका रोज़ेला पॉस्टोरिनो ने जब मार्गोट वोक के बारे में रोम के एक अख़बार में पढ़ा तो उन्हें इस कहानी ने बेहद आकर्षित किया.
फिर क्या था रोज़ेला पॉस्टोरिनो ने उन महिलाओं की खोज शुरू कर दी जिनका इस्तेमाल गिनी पिग की तरह किया जााता था और वो हिटलर के लिए बना खाना चखती थीं.
इस खोज का नतीजे बनी एक किताब ''ला कैटादोरा'', जिसकी शुरुआत मार्गोट वोक से होती है. इस किताब को इटली में कई पुरस्कार मिले. अब ये किताब स्पैनिश में भी प्रकाशित होने वाली है.
हिटलर के लिए काम करने वाली इन महिलाओं पर किताब क्यों लिखी?
एक दिन मैंने इटली के एक अख़बार में मार्गोट वोक के बारे में एक लेख पढ़ा. मार्गोट बर्लिन में रहने वालीं 96 साल की बुजुर्ग महिला थीं जिन्होंने पहली बार हिटलर की टेस्टर होने के काम को ज़ाहिर किया था.
यह बहुत हैरान करने वाला था, इसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता था. मैं ख़ुद पॉलैंड में वुल्फशांज़ गई, जिसे वुल्फ़ डेन भी कहते हैं, द्वितीय विश्वयुद्ध 2 के दौरान अडॉल्फ हिटलर का सबसे बड़ा मिलिट्री बैरक था. वहां मैंने कई लोगों से पूछा कि वो हिटलर के टेस्टर्स के बारे में कुछ जानते हैं क्या, लेकिन किसी ने इसके बारे में नहीं सुना था. यह कुछ ऐसा था जो कभी प्रकाशित नहीं हुआ था.
और तब, उन्होंने जांच करनी शुरू की...
मैं वाकई नहीं जानती थी कि मैं क्या करना चाहती हूं. लेकिन, मुझे लग रहा था कि कुछ मुझे बुला रहा है, मुझे खींच रहा है. मैं मार्गोट वोक से मिलना चाहती थी. इसलिए मैंने उस मीडिया हाउस से मदद मांगी जिसने उनका इंटरव्यू किया था. लेकिन, वहां से कोई जवाब नहीं आया.
लेकिन, जर्मनी की एक दोस्त के जरिए मुझे मार्गोट के घर का पता मिला और मैंने उनसे मिलने के लिए उन्हें ख़त लिखा लेकिन उसी हफ़्ते उनकी मौत हो गई.
इसके बाद मैं निराश हो गई. मुझे लगा कि मार्गोट की मौत इस बात की निशानी है कि मुझे ये प्रोजेक्ट छोड़ देना चाहिए.
लेकिन, मेरे दिमाग से ये कहानी निकल भी नहीं पा रही थी. एक ऐसी विरोधाभासी कहानी जो पूरी मानवीयत का विरोधाभास समाहित करती है.
No comments:
Post a Comment