Thursday, November 22, 2018

अडॉल्फ हिटलर की ख़ातिर 'ज़हर चखने' वाली औरत की कहानी

कल्पना करें कि तरह-तरह के लज़ीज खाने से भरी एक मेज़ है और उसके आसपास कई नौजवान महिलाएं बैठी हैं. उन्हें बहुत तेज भूख भी लग रही है.

लेकिन, उस खाने से उनकी मौत हो सकती है. फिर भी उन्हें वो सब खाना पड़ता है.

पर 1942 में ये कल्पना एक हक़ीक़त थी. वो दौर द्वितीय विश्वयुद्ध का था. जब 15 महिलाओं को अपनी जान ताक पर रखकर जर्मनी के तानाशाह अडॉल्फ हिटलर की जान बचाने का काम दिया गया था.

इन 15 महिलाओं का काम था कि वो अडॉल्फ हिटलर के लिए बने खाने को पहले चखा करती थीं ताकि उसमें ज़हर है या नहीं, ये पता लग सके.

हैरानी वाली बात ये है कि दिसंबर 2012 से पहले कोई इस बारे में जानता तक नहीं था. ये राज़ तब खुला जब मार्गोट वोक नाम की एक महिला ने 70 साल की चुप्पी तोड़ने का फैसला किया और बताया कि वो हिटलर की उस टीम में थी जो खाना चखने का काम करता था. इन्हें टेस्टर्स भी कहते हैं.

इटली की एक लेखिका रोज़ेला पॉस्टोरिनो ने जब मार्गोट वोक के बारे में रोम के एक अख़बार में पढ़ा तो उन्हें इस कहानी ने बेहद आकर्षित किया.

फिर क्या था रोज़ेला पॉस्टोरिनो ने उन महिलाओं की खोज शुरू कर दी जिनका इस्तेमाल गिनी पिग की तरह किया जााता था और वो हिटलर के लिए बना खाना चखती थीं.

इस खोज का नतीजे बनी एक किताब ''ला कैटादोरा'', जिसकी शुरुआत मार्गोट वोक से होती है. इस किताब को इटली में कई पुरस्कार मिले. अब ये किताब स्पैनिश में भी प्रकाशित होने वाली है.

हिटलर के लिए काम करने वाली इन महिलाओं पर किताब क्यों लिखी?

एक दिन मैंने इटली के एक अख़बार में मार्गोट वोक के बारे में एक लेख पढ़ा. मार्गोट बर्लिन में रहने वालीं 96 साल की बुजुर्ग महिला थीं जिन्होंने पहली बार हिटलर की टेस्टर होने के काम को ज़ाहिर किया था.

यह बहुत हैरान करने वाला था, इसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता था. मैं ख़ुद पॉलैंड में वुल्फशांज़ गई, जिसे वुल्फ़ डेन भी कहते हैं, द्वितीय विश्वयुद्ध 2 के दौरान अडॉल्फ हिटलर का सबसे बड़ा मिलिट्री बैरक था. वहां मैंने कई लोगों से पूछा कि वो हिटलर के टेस्टर्स के बारे में कुछ जानते हैं क्या, लेकिन किसी ने इसके बारे में नहीं सुना था. यह कुछ ऐसा था जो कभी प्रकाशित नहीं हुआ था.

और तब, उन्होंने जांच करनी शुरू की...

मैं वाकई नहीं जानती थी कि मैं क्या करना चाहती हूं. लेकिन, मुझे लग रहा था कि कुछ मुझे बुला रहा है, मुझे खींच रहा है. मैं मार्गोट वोक से मिलना चाहती थी. इसलिए मैंने उस मीडिया हाउस से मदद मांगी जिसने उनका इंटरव्यू किया था. लेकिन, वहां से कोई जवाब नहीं आया.

लेकिन, जर्मनी की एक दोस्त के जरिए मुझे मार्गोट के घर का पता मिला और मैंने उनसे मिलने के लिए उन्हें ख़त लिखा लेकिन उसी हफ़्ते उनकी मौत हो गई.

इसके बाद मैं निराश हो गई. मुझे लगा कि मार्गोट की मौत इस बात की निशानी है कि मुझे ये प्रोजेक्ट छोड़ देना चाहिए.

लेकिन, मेरे दिमाग से ये कहानी निकल भी नहीं पा रही थी. एक ऐसी विरोधाभासी कहानी जो पूरी मानवीयत का विरोधाभास समाहित करती है.

Monday, November 12, 2018

देश का पहला इनलैंड वॉटरवे टर्मिनल शुरू

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को 15वीं बार अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी पहुंचे। रामनगर स्थित गंगा तट पर नेशनल वॉटरवे-1 के मल्टी मॉडल टर्मिनल (बंदरगाह) की शुरुआत की। यह देश का पहला इनलैंड वॉटरवे (नदी मार्ग) टर्मिनल है। इस दौरान मोदी ने कहा कि काशीवासी साक्षी हैं कि चार साल पहले जब मैंने बनारस और हल्दिया को जल मार्ग से कनेक्ट करने का विचार रखा था, तो किस तरह से इसका मजाक उड़ाया गया था। थोड़ी देर पहले कलकत्ता से आए जहाज ने आलोचना करने वालों को जवाब दे दिया है।

मोदी ने कहा, "वाराणसी और देश विकास के उस कार्य का गवाह बना है, जो दशकों पहले होना जरूरी था, लेकिन नहीं हुआ। आज देश नेक्स्ट जेनरेशन इन्फ्रास्ट्रक्चर की अवधारणा का गवाह बना है। इस पवित्र भूमि से हर किसी का अध्यात्मिक संपर्क तो है ही, आज जल-थल-नभ तीनों को जोड़ने वाली नई ऊर्जा का संचार हुआ है। कुछ देर पहले मैंने नदी मार्ग से पहुंचे देश के पहले कंटेनर व्हीकल का स्वागत किया। इस काम में दशकों लग गए, लेकिन आज मैं खुश हूं कि देश ने जो सपना देखा था, वो आज काशी की धरती पर साकार हुआ है।"

'जल मार्ग से समय और पैसा दोनों बचेगा'
प्रधानमंत्री ने कहा, ''मल्टी मॉडर्न टर्मिनल से जब रो-रो सर्विस शुरू होगी तो लंबी दूरी तय करने के लिए आपको एक नया विकल्प मिलेगा। बड़े-बड़े वाहन जहाज से सीधे दूसरी जगह पहुंच जाएंगे। जितना सामान इस जहाज से आया है, उसे अगर सड़क से लाया जाता तो 16 ट्रक लगते। जल मार्ग से लाने की वजह से प्रति कंटेनर लगभग साढ़े चार हजार रुपए की बचत हुई है। 70-75 हजार रुपया सीधा बच गया है। जल मार्ग से समय और पैसा बचेगा।''

'आजादी के बाद जल मार्गों की उपेक्षा हुई'
उन्होंने कहा, ''एक जमाना था, जब देश की नदियों में बड़े-बड़े जहाज चला करते थे। लेकिन, आजादी के बाद इतने सालों में इन मार्गों की उपेक्षा की गई। देश की सामार्थ्य के साथ पहले की सरकारों ने अन्याय किया, उसे समाप्त करने का काम किया। आज देश में 100 से ज्यादा नेशनल वाटर वे पर काम हो रहा है। वाराणसी-हल्दिया उनमें से एक है। 5 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करके इस रास्ते में सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। पूर्वी भारत के बड़े हिस्से को बहुत बड़ा फायदा होने वाला है। ये जलमार्ग सिर्फ सामान की ढुलाई के लिए काम नहीं आएगा, टूरिज्म को, हमारे तीर्थों को पूर्वी एशियाई देशों को जोड़ने का काम करने वाला है।''

मोदी ने पहले मालवाहक जहाज की अगवानी की

मोदी ने हल्दिया से वाराणसी पहुंचे पहले मालवाहक जहाज की अगवानी की। 1620 किलोमीटर लंबे वॉटरवे से गंगा के जरिए वाराणसी से कोलकाता के हल्दिया के बीच माल ढुलाई आसान होगी। इसे जलमार्ग विकास परियोजना के तहत तैयार किया गया। इसके लिए वर्ल्ड बैंक से भी मदद मिली है।